
महान शिक्षक- “अरस्तू”-
सिकन्दर महान का गुरु होने के नाते अरस्तू की महत्ता प्रतिपादित करने वालों की अपनी धारणा बदल कर यह मान लेना चाहिये कि सिकन्दर जैसा शिष्य पाकर अरस्तु महान् नहीं हुए, बल्कि अरस्तू जैसा गुुरु पाकर ही सिकन्दर महान् बना है। एक साधारण मिट्टी से बने राजकुमार सिकन्दर को फौलादी बना देने का श्रेय अरस्तू को ही है।
विद्वान् अरस्तू का जीवन लक्ष्य लोक-शिक्षा ही था। उन्होंने जीवन में जो भी विद्या, विचार, बुद्धि अथवा सद्गुणों का अर्जन छिपा था वह सब उन्होंने व्यक्ति के निर्माण करने में ही लगा दिया। उन्होंने अपनी महान् उपलब्धियों का उपयोग व्यक्तिगत लाभ के लिये कभी नहीं किया। संसार में सिकन्दर ने जो कुछ भी बल, वैभव, यश अथवा महानता पाई, उसके पीछे अरस्तू की ही वह शिक्षा काम कर रही थी, जो उन्होंने एक-एक सिकन्दर को ही नहीं पूरे राष्ट्र को दी थी। सिकन्दर की सेना का एक सैनिक सिकन्दर की तरह वीर और बलशाली व्यक्ति था। एक अकेले सिकन्दर में वह शक्ति किस प्रकार सम्भव हो सकती थी कि संसार को विजय करने का साहस कर सकता। अथवा कमजोर चरित्र और निर्बल हृदय वाले व्यक्तियों की सेना लेकर दूर देशों तक जाकर इतिहास का निर्माण कर पाता। यह अरस्तू की शिक्षाओं का ही जादू था कि मेसीडोनिया जैसे क्षुद्र देश के लोग इतने वीर, साहसी और कष्ट सहिष्णु बन सके, जो उन्होंने तूफानों की बीच से रास्ता बनाकर भी अपने देश के यश और प्रभाव का विस्तार किया। सिकन्दर और उसका बल स्वयं में कुछ नहीं था। वह जो कुछ था महान् विद्वान् अरस्तू की शिक्षाओं का ही परिणाम था।
मेसीडोन के राजा फिलिप अपने पुत्र को कुछ बनाना चाहते थे। इसके लिए सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात की थी कि योग्य गुरु मिले। बहुत तलाश के बाद दार्शनिक अरस्तू इस योग्य दिखाई दिये कि वे किसी बच्चे का निर्माण कर सकते हैं। फिलिप विद्वान् और व्यक्ति निर्माता गुरु का मूल्य समझते थे। उन्होंने अरस्तू के पास अपना सन्देशवाहक पत्र लेकर भेजा और लिखा—‘‘भगवान् ने मुझे एक पुत्र दिया है उसकी मुझे खुशी है, पर उससे भी अधिक खुशी इस बात की है कि वह इस जमाने में पैदा हुआ जब कि आप जैसे व्यक्ति निर्माता दार्शनिक मौजूद हैं। इसे मैं आपके द्वारा ऐसा शिक्षित और सुसंस्कृत बना हुआ देखना चाहता हूँ जो हमारे कुल को प्रकाशित करे। ’’ अरस्तू ने इसे स्वीकार कर लिया और एक साधारण से राजकुमार को महान् सिकन्दर बना दिया, जिसका नाम पराक्रमी योद्धओं के इतिहास में सदा अमर रहेगा।
सघन वृक्षों की छाया में पत्थर की शिला पर बैठ कर अरस्तू शिक्षा दिया करता था, शिष्य चारों ओर से उसे घेर कर बैठ जाते थे और जीवन के गूढ़ विषयों पर अनुसंधान चलता रहता था। गुरु अपने शिष्यों को लेकर कभी-कभी घने वृक्ष कुंजों में, वन-पर्वतों में चले जाते थे और वहाँ नदी सरोवरों के तट पर बैठ कर शिक्षण-क्रम चला करता था।
सिकन्दर जब शिक्षा प्राप्त करके लौटा तो उसका पिता फिलिप अपने पुत्र के गुणों को देखकर मुग्ध हो गया। उसने अरस्तू के प्रति सच्चे हृदय से कृतज्ञता प्रकट करते हुए सिकन्दर से कहा—‘‘तुम्हारे गुरु का हम अभी तक समुचित सम्मान नहीं कर सके। वे वस्तुतः उच्चतम सम्मान के पात्र है। तुम्हारे निर्माण का सारा श्रेय उन्हीं को है।’’ सिकन्दर ने भी एक प्रसंग में अपने उद्गार प्रकट करते हुए कहा—‘‘पिता से तो मैंने शरीर मात्र प्राप्त किया है। वस्तुतः मेरे पिता तो अरस्तू हैं जिनने मुझे अनुपम ज्ञान देकर कुछ से कुछ बना दिया।’’
सिकन्दर ने जो गुण, स्वभाव और चरित्र गुरु के समीप रहकर प्राप्त किया था, उसी के बल पर उसने अनेकों देशों को जीता, विशाल साम्राज्य बनाया और बड़ी-बड़ी सफलताएँ प्राप्त की। शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त सिकन्दर ने आजकल के विद्यार्थियों की तरह गुरु की ओर से अपना मुँह नहीं मोड़ लिया, वरन् उनके कार्य को प्रगति देने के लिए भरपूर सहायता की। अरस्तू ने ऐथेन्स नगर में लीसियम नामक एक विशाल सांस्कृतिक विद्यालय की स्थापना की जिसमें हजारों की संख्या में छात्र विद्याध्ययन करते थे। न केवल यूनान में, वरन् सारे संसार में वह ज्ञानपीठ एक से एक योग्य शिष्य निकाल सकने के कारण प्रख्यात हो गई।
इस लिसियम विद्यापीठ को सिकन्दर की सहायता प्राप्त थी। अरस्तू अपने शोध कार्य में लगे थे। वे विभिन्न जीव-जन्तुओं की जीवन प्रणाली के संबन्ध में खोज कर रहे थे। इस कार्य के लिए अपेक्षित सामग्री तथा कार्यकर्ता जुटाने का व्यय भार भी सिकन्दर ने अपने ही ऊपर लिया था। अरस्तू का जन्म स्टेगिर नामक गाँव में हुआ था। किसी अत्याचारी शासन ने उसे क्रुद्ध होकर उजाड़ दिया था। वहाँ के निवासी अन्यत्र भाग गये थे। गुरु के सम्मान में सिकन्दर ने उस नगर को फिर से बसाया और जो लोग बाहर भाग गये थे उन्हें सब प्रकार की सहायता देकर वापस उस नगरी में बसाया। शिष्य अपने गुरु की नगरी को उजड़ी हुई नहीं देख सकता था।
इटली के प्रसिद्ध कवि दान्ते ने अरस्तू को विद्वानों का अग्रतम नेता कहा। वह अपने समय का विचार सम्राट था। उसके शब्दों के साथ उसका चरित्र भी बोलता था। लगभग सवा दो हजार वर्ष उसके समय को बीते हो गये। फिर भी वह आज तक मानव जीवन के विभिन्न विचार क्षेत्रों को प्रभावित करता है।
अरस्तू अपने शिष्यों के चरित्र गठन के लिए बहुत जोर देकर आदेश दिया करते थे। एक बार सिकन्दर का किसी स्त्री से अनुचित सम्बन्ध हो गया। अरस्तू उसे झिड़कते थे पर वह मानता न था। उस स्त्री को पता चला कि अरस्तू उसके मार्ग में काँटा है इसलिए उसने सोचा कि उसे बदनाम करके सिकन्दर से शत्रुता करा देनी चाहिए। वह एक दिन अरस्तू के पास पहुँची और एकान्त में मिलने के लिए प्रस्ताव किया। अरस्तू ने स्वीकार कर लिया और जिस उद्यान में उन्हें बुलाया गया था वहाँ नियत समय पर जा पहुँचे।
अरस्तू ने अपने शिष्यों द्वारा सिकन्दर तक भी यह सूचना पहुँचा दी थी, पर सूचना अरस्तू ने कहलवाई है यह न बताने का आदेश कर दिया था सिकन्दर छिपा हुआ टोह में बैठा ही था। वह तरुणी आई। उसने अरस्तू के गले में हस्तपाश डाले और कहा—क्या ही अच्छा हो कुछ देर खेलें। अरस्तू ने स्वीकृति दे दी । युवती ने उन्हें घोड़ा बनाया और खुद उनकी पीठ पर बैठकर चलाने लगी। बूढ़ा घोड़ा लड़की को पीठ पर बिठाकर घुटनों के बल चला रहा था कि सिकन्दर सामने आ पहुँचा। उसने क्रोध में आकर कहा—गुरुजी यह क्या?
अरस्तू ने अविचल भाव से धैर्यपूर्वक कहा—बेटा, पहले ही मैं कहा करता था। देखते नहीं, मुझ जैसे विद्वान् और बूढ़े को जो माया इस तरह घुटनों के बल चलने को विवश कर सकती है वह तुम जैसे अपरिपक्व बुद्धि के नौजवानों को तो पेट के बल रेंगा कर और नाक रगड़ा कर ही दम लेगी। यदि तुम इस मार्ग से मुँह न मोड़ोगे तो इतिहास में नाम अंकित न करा सकोगे। अरस्तू के इस शिक्षण ने सिकन्दर पर भारी प्रभाव डाला और तबसे उसने उस ओर से मुँह ही मोड़ लिया।
कुछ विद्वानों का कथन है कि अरस्तू ने चार सौ ग्रन्थ लिखे। कोई-कोई उनकी संख्या एक हजार बताते हैं। उसके सभी ग्रन्थ आज उपलब्ध नहीं पर जो उपलब्ध है उनसे पता चलता है कि उसे तर्कशास्त्र, खगोल विद्या, भौतिकी, विकास, काम-शास्त्र, वायु विज्ञान, प्रकृति विद्या, जन्तु-शास्त्र, काव्य, अलंकार, मनोविज्ञान, राजनीति, आचार-शास्त्र, दर्शन, अध्यात्म आदि अनेक विषयों का अगाध ज्ञान था।
अरस्तू आत्मोन्नति के लिए सामाजिक और सामूहिक जीवन को आवश्यक मानता था और एकाकी जीवन या एकान्तवास के विरुद्ध था। उसने लिखा है— एकाकी जीवन व्यतीत करने के लिए या तो मनुष्य को पशु बनना पड़ेगा या देवता।
